जूट के बैग बना आत्मनिर्भर बनीं कोमल और पारूल, आज है सालाना 20 लाख का टर्नओवर
- 20-20 महिलाओं को दे रखा है रोजगार, स्वयं सहायता समूह से जुड़कर सीखा काम
- हर घर तिरंगा के तहत बनाए 90 हजार झंडे
गाजियाबाद। स्वयं सहायता समूह से जुड़कर कोमल और पारुल ने जूट के बैग बनाना सीखा और आज उन्होंने इसके माध्यम से 20 से अधिक महिलाओं को रोजगार दे रखा है। समूह के जरिए लोन लेकर वह अपने काम को लगातार बढ़ा रही हैं और लोगों को जागरूक कर रही हैं।
रजापुर ब्लॉक के जलालाबाद गांव की निवासी पारूल श्रेष्ठ स्वयं सहायता समूह से जुड़ी हैं। उनका कहना है कि वह महिलाओं को सिलाई, कढ़ाई सिखाती हैं। सरकारी योजना के तहत प्रशिक्षण लेकर वह स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं और जूट के बैग बनाने सीखे। उनका कहना है कि इससे बहुत फायदा हुआ। आज उनके साथ 20 से अधिक महिलाएं बैग बनाने के काम में जुड़ी हुई हैं। आजकल लोगों को जूट के बैग बहुत पसंद आ रहे हैं, इसलिए बहुत मांग है। उनके पास 50 से 500 रुपये तक के बैग है। सरकारी कार्यक्रमों और स्कूलों में इसकी काफी मांग रहती है। वह कहती हैं कि समूह से जुड़ने के बाद उनका व्यापार काफी बढ़ा है। इसके जरिए लोन आसानी से मिल जाता है और सब्सिडी भी मिलती है। महिलाएं इससे जुड़कर आत्मनिर्भर बन सकती हैं। वह कहती हैं कि वह महिलाओं को जागरूक भी कर रहीं हैं और प्रशिक्षण भी देती हैं।
मुरादनगर ब्लॉक के नवीपुर गांव की कोमल ने एक बड़ी यूनिट लगाई है। जिसमें जूट के बैग बनाने के साथ हर घर तिरंगा के तहत मिले 90 हजार ऑर्डर भी पूरे किए गए। कोमल कहती हैं कि उन्होंने अपना उद्योग बढ़ाने के लिए एमएसएमई के तहत 10 लाख का लोन लिया और 12 मशीनें लगाईं। वह कहती हैं कि वह अपने ऑर्डर जैम पोर्टल के माध्यम से बेचती हैं। जूट के बैग की सबसे अधिक मांग सरकारी विभागों, स्कूलों, स्टोर्स और निजी संस्थानों में होती है। मंगलमूर्ति स्वयं सहायता समूह के तहत काम कर रहीं कोमल समूह के अलावा अन्य महिलाओं को भी रोजगार दे रही हैं। उनका सालाना टर्नओवर 20 लाख रुपये तक का है।