बचपन में बहुत शरारती थे हरीश, पढ़ने में थे होनहार
गाजियाबाद। हरीश राणा बचपन में बहुत ही शरारती थे। जब मां डांटती तो वह कोने में छिप जाते थे। पहला बच्चा होने के कारण वह बहुत प्यार-दुलार से पले। शुक्रवार देर रात या शनिवार तड़के उनको इच्छामृत्यु के लिए एम्स में शिफ्ट करने के बीच उनकी मां की आंखों के आगे बचपन का पूरा मंजर घूम गया।
हरीश की 12वीं तक की पढ़ाई दिल्ली में पूरी हुई। इसके बाद बीटेक करने के लिए चंडीगढ़ चले गए। मां निर्मला राणा कहती हैं कि बेटा पढ़ने में शुरू से ही बहुत होनहार था। पंजाब यूनिवर्सिटी में भी वह टॉपर था। उनका जन्म 12 सितंबर 1993 में दिल्ली के ईएसआई अस्पताल में हुआ था। उस समय पूरा परिवार खुशी से झूम उठा था। खूब गीत गाए गए थे। जब भी मैं उसे डांटती वह छुप जाता और थोड़ी देर बार आकर चेहरे को सहलाने लगता। मैं झट गले लगा लेती। कभी किसी चीज के लिए जिद नहीं करता, जो कहते हैं उसे प्यार से मान लेता। राजा बेटा था, मेरा 21 अगस्त 2013 में उस दिन हमारी दुनिया ही उजड़ गई, जब उसके गिरने की मनहूस खबर आई और कुछ दिन बाद पता चला कि इस बीमारी में ठीक होने की संभावना बेहद कम है, फिर भी आस में 13 साल काट दिए, लेकिन लाख कोशिशों के बाद कभी कोई सुधार नहीं दिखा। कोई व्रत, पूजा-पाठ नहीं छोड़ा, इस दौरान भगवान से भी विश्वास उठ गया, लेकिन नियति को यही मंजूर था। बेहद हंसमुख मिजाज का था मेरा हरीश। हमेशा हंसता रहता, लोगों को हंसाता रहता। हादसे के अगले महीने ही उसका जन्मदिन था, जिस पर घर आने वाला था, पर उसके बाद वह ऐसा लौटा कि कभी जा ना सका। सिविल इंजीनियर बनना चाहता था लेकिन आज सालों से बिस्तर पर लेटा हुआ है। लेटे-लेटे जगह-जगह बैडसोर हो गए हैं, हम प्रतिदिन उसकी सफाई करते हैं, लेकिन अब उसकी तकलीफ देखी नहीं जाती। भगवान उसे अब पीड़ा से मुक्ति दे, हमारी यही कामना है।