- बेटे के अंतिम वक्त भी लोग फायदा उठाने से नहीं चूक रहे
- सेवा नहीं, फायदा देखकर आते हैं सामने

गाजियाबाद। अशोक राणा ने इन 13 वर्षों के संघर्ष में काफी कुछ झेला है। सरकारी सिस्टम से लेकर समाज में असंवेदनशील होते लोगों पर उन्होंने गहरी चिंता जताई। जब शुक्रवार रात को उनके परिवार से मिलने का मौका मिला तो परिजनों ने लोगों के शब्दों पर कड़ी आपत्ति जताई। साथ ही असंवेदनशील मीडिया को भी उन्होंने आड़े हाथों लिया।

इस मुलाकात के दौरान मां निर्मला राणा ने कहा कि हमारा बेटा ईश्वर की गोद में जाने वाला है, लेकिन कुछ मीडियाकर्मियों ने बेहद आपत्तिजनक सवाल पूछे कि क्या कोई मां ऐसी बातों पर टिप्पणी कर सकती है। जिसे नौ महीने कोख में रखा। बचपन से पाला पोसा। 13 सालों से जिसकी फिर एक बच्चे की तरह सेवा कर रहे हैं, उससे ऐसा सवाल कि इस समय आपको कैसा लग रहा है, आप बताइए इसका क्या जवाब देगी कोई मां। आंखों में आंसू लिए वह कहती हैं कि हमने कभी उम्मीद नहीं की थी कि हमें ऐसा फैसला लेना होगा, लेकिन अब ढलती उम्र में इसे कौन देखेगा, कौन करेगा इसकी देखभाल। हम भी बुजुर्ग हो चुके हैं, चार सालों के कानूनी संघर्ष के बाद यह निर्णय आया। इससे बेटे को पीड़ा से मुक्ति मिलेगी। कौन माता-पिता ऐसा चाहते हैं, पर क्या करें पिछले 13 सालों में सुधार की कोई गुंजाइश नजर आई। बस आंख खोले रहता है और सो जाता है। कुछ बताते हैं तो कभी रिएक्शन नहीं आता। सांस नली से, खाना नली से, शौच नली से। बताइए ऐसे जीवन कब तक चलेगा। हमने जिगर पर इस समय पत्थर रखा हुआ है। हम पर क्या बीत रही, हमी भी समझ सकते हैं। हरीश की बहन भावना भी अपने बच्चे के साथ यहीं थीं। वह कहती हैं कि हमने सिस्टम की बहुत खामियां देखीं। अंत में हमें कहीं अस्पताल में रखने से बेहतर भाई को घर रखना ही बेहतर लगा।
सबने फायदा उठाया और अब अंत समय भी यही हो रहा है
अशोक राणा कहते हैं सुप्रीम कोर्ट के शुरूआती फैसले में तीन ऑप्शन दिए गए थे। बच्चे को मनचाहे अस्पताल में रखें, एनजीओ ले जाए या फिर आप घर पर रखो। हमने तब नोएडा 39 के सुपरस्पेशिलिटी सरकारी अस्पताल में रखा। वहां पूरा स्टाफ कांट्रेक्ट पर, कभी भी गायब हो जाता है। हमें लगा कि उससे ज्यादा ध्यान हम घर पर रख सकते हैं। सरकारी चाहे सुपरस्पेशिलिटी हो, लेकिन वहां सफाई नहीं होती। यह सब देख हमारा सरकारी सिस्टम से मन भर गया और हम घर ले आए। सीएमओ ने एक फिजियोथेरेपी भेजा, जो 14 दिन आया, फिर गायब। नर्स आईं उसे पेट में लगाए गए पैग सेट के जरिए खाना खिलाना नहीं आता था। नोएडा के सीएमओ ने फिर प्राइवेट फिजियोथेरेपिस्ट रखने को बोला, भुगतान सरकार करेगी लेकिन जैसे ही प्राइवेट फिजियोथेरेपिस्ट को पता चला कि भुगतान सीएमओ ऑफिस से होगा, वह बोला फिर तो भुगतान मिलने की संभावना कम है, लेकिन मेरा लाइसेंस नहीं बना है, वो बनवा लूंगा। अशोक बोले हर किसी ने फायदा सोचा, सेवा नहीं। गाजियाबाद के सरकारी अस्पतालों से दवाइयां आतीं, लेकिन नली जो आती कभी छोटी तो कभी बड़ी। कभी साइज की नहीं आई, लेकिन किसी ने अब कोई गिला शिकवा नहीं। अब अंत समय में केस लड़ने वाले वकील, सोसायटीवासी खूब बाइट दे रहे हैं। सब अपना फायदा देख रहे हैं, आप क्या कहेंगे ऐसे असंवेदनशील समाज को। पत्रकार आए बिना पूछे कॉलर आईडी लगा दी। आप बताइए, हम क्या करें। हम तो शांतिप्रिय हैं और अब शांति से एम्स जाना चाहते हैं। हम बात करके थक चुके हैं, हमें शांति चाहिए।