नई दिल्‍ली। एंकिलोसिंग स्पॉन्डिलाइटिस जैसी गंभीर बीमारी के कारण ओडिशा के कटक जिले के रहने वाले मानस रंजन दास की गर्दन नहीं मुड़ती। उसके बावजूद 600 रुपये नौकरी से कॅरियर की शुरूआत करने वाले रंजन का अब सालाना र्टनओवर 24 लाख रुपये है। उनकी कहानी संघर्षों से भरी रही। 
2000 में ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने एक मोबाइल फोन की दुकान में सेल्समैन के तौर पर काम किया, जहां उन्हें महीने के 600 रुपये मिलते थे। इसके बाद उन्होंने कई और काम किए, पर किसी में सफलता नहीं मिली। 2016 में उन्होंने ढेंकनाल के साई कृपा कॉलेज में नौकरी शुरू की, जहां उन्हें 10,000 रुपये प्रतिमाह मिलने लगे। इसी दौरान, उनकी मुलाकात ढेंकनाल जिले के मुक्तापासी गांव के चार सफल मशरूम किसानों से हुई। उनसे प्रेरित होकर उन्होंने मशरूम की खेती का रास्ता चुना। 2017 में एक नौसिखिए के तौर पर मानस ने ट्रायल बेस पर मशरूम की खेती शुरू की।
आज उन्होंने कम लागत वाली तकनीकों और वैज्ञानिक प्रशिक्षण के बल पर मशरूम की खेती को एक सफल बिजनेस मॉडल में बदल दिया है। आज वह न केवल सालाना लाखों का कारोबार कर रहे हैं, बल्कि सैकड़ों अन्य किसानों और स्वयं सहायता समूहों के लिए मार्गदर्शक बनकर उभरे हैं। कभी 600 रुपये महीने की नौकरी करने वाले मानस आज 24 लाख के टर्नओवर वाले बिजनेस के मालिक हैं। 

सफलता का मुख्य मंत्र लागत में कटौती
मानस की सफलता का मुख्य मंत्र लागत में कटौती है। उन्होंने लोहे या स्टील के महंगे स्‍ट्रक्‍चर के बजाय 250 बांस के डंडों और किफायती 'शेड नेट' का इस्‍तेमाल करके अपना फार्म तैयार किया। इससे उनकी शुरुआती लागत काफी कम हो गई। वह मार्च से अक्टूबर तक 'पैडी स्ट्रॉ' मशरूम और नवंबर से फरवरी तक 'ऑयस्टर' मशरूम उगाते हैं। इससे उनकी आय सालभर बनी रहती है। जहां ज्‍यादातर किसान मशरूम के बीज (स्पॉन) बनाने के लिए महंगे गेहूं के दानों का इस्‍तेमाल करते हैं, वहीं मानस पश्चिम बंगाल से मंगवाई गई 'वेस्ट कॉटन' का उपयोग करते हैं। यह कपास न केवल 19 रुपये प्रति किलो की सस्ती दर पर मिलती है, बल्कि इसमें मौजूद सेल्युलोज मशरूम की तेजी से ग्रोथ में भी मदद करता है। उनके फार्म से हर महीने 70-80 किलो ऑयस्टर मशरूम और रोजाना लगभग 30 किलो पैडी स्ट्रॉ मशरूम का उत्पादन होता है। इससे वह औसतन दो लाख का मासिक टर्नओवर हासिल कर रहे हैं।

बिना बिके मशरूम से भी होती है आय
मानस बिना बिके मशरूम को सुखाकर पाउडर बना लेते हैं, जो 1000 रुपये प्रति किलो तक बिकता है। अपनी पत्नी रितांजलि के साथ मिलकर वह वार्षिक 'बाली यात्रा' मेले के लिए मशरूम के अचार, कुकीज और पाउडर तैयार करते हैं। इस मेले से वह 1.5 लाख रुपये से 2 लाख रुपये तक की अतिरिक्त कमाई कर लेते हैं। 

दूसरे किसानों की भी कर रहे मदद
मानस की यह यात्रा आसान नहीं थी। साल 2017 में उनका पहला प्रयास बुरी तरह विफल रहा था। उन्हें 1.42 लाख रुपये का कर्ज भी लेना पड़ा था, लेकिन हार मानने के बजाय उन्होंने केवीके और इमेज जैसे संस्थानों से प्रशिक्षण लिया और इंटरनेट के जरिये अपनी तकनीक को निखारा। 2022 में 'नवाचारी किसान' का सम्मान पाने वाले मानस अब तक 200 से ज्‍यादा स्वयं सहायता समूहों को मुफ्त प्रशिक्षण दे चुके हैं। एक सलाहकार के रूप में वह नए किसानों की मदद कर रहे हैं।